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कौन लिखेगा पुरखों पर कहानियां

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  कौन लिखेगा पुरखों पर कहानियां रामनाथ शिवेंद्र आज के जटिल समय में पुरखों को कहानियों में जगह नहीं मिल रही, मिलनी चाहिए कि नही विमर्श का विषय है। पुरखे यानि वरिष्ठ नागरिक ये न केवल अपने बनाये घर, मकान से बेदखल किये जा रहे हैं वरन् कहानियों, लेखों, संस्मरणों आदि से भी बेदखल किये जा रहे हैं। पुरखों पर कहानियॉ लिखने का प्रचलन नहीं के बराबर है। जबकि पुरखों के मुद्दे पर चर्चा करना, उन्हें कथाओं में लाना, एक तरह से मानव सभ्यताओं द्वारा अपनाये गये सŸाा कौतुकों के विमर्श का ही मामला है। पुरखे किसी टापू से प्रकट हुए अनजाने व्यक्ति नहीं हैं, किसी दूसरी सभ्यता का यात्री नहीं, बल्कि हमारे अपने पारिवार के मुखिया ही हैं। ये वही व्यक्ति हैं जिनकी गोदी में खेलते कूदते, चूमते, चाटते हम समझदार हुए हैं। ये वही मुखिया हैं जिनका बहुत ही कूट चालाकी से वरिष्ठ नागरिक में रूपांतरण किया जा चुका है या किया जा रहा है। हमें बहुत ही गंभीरता से परिवार के मुखिया यानि हमारे पुरखों का यह जो वरिष्ठ नागरिक के रूप में रूपांतरण है उसे समझना, व बूझना होगा। ऐसा अचानक नहीं...